टीस

>> Thursday, 6 December 2007




जब विचार मन में हों उलझे,
और बुद्धि को भ्रम भारी,
मिलती नहीं राह जब कोई,
बढ़ती जाती फिर लाचारी,
आगे बढ़ने के प्रयास में,
ठोकर पल-पल लगती है,
मुझसे मत पूछो तुम आकर,
टीस मुझे क्यों उठती है ?
है उदार अब अर्थ-नीति,
हम स्वागत में लगते बिछने,
पूंजी के बढ़ते प्रवाह में,
लगे आंकड़े स्वच्छ सलोने
घटती मुद्रा की स्फीति,
भूख कुलांचे भरती है
मुझसे मत पूछो तुम आकर,
टीस मुझे क्यों उठती है ?
ठेके वाले और अधिकारी-नेता,
का गठजोड़ बना है
कर चोरों की मौज हुई,
और आम आदमी अदना है,
तीन महीने मात्र पुरानी,
सड़क उधड़ने लगती है
मुझसे मत पूछो तुम आकर,
टीस मुझे क्यों उठती है ?
नई सदी में क्या कुछ सीखा,
कैसे कहें और कितना ?
शिक्षा के ऊँचे आयाम में,
हम तो गिर गये हैं इतना,
महिलाओं की ध्वनियां भी,
जब और सिसकने लगती हैं
मुझसे मत पूछो तुम आकर,
टीस मुझे क्यों उठती है ?
बम विस्फोटों से मरते हैं,
कौन कहीं कब रोता है ?
मेरा मन जब ख़ून के धब्बे,
फिर आंसू से धोता है
राष्ट्रवाद की होली जब भी,
"मत" की आग में जलती है
मुझसे मत पूछो तुम आकर,
टीस मुझे क्यों उठती है ?
भगत, सुभाष, राजगुरु, बिस्मिल,
और नरेन्द्र की थाती हैं
गांधी, नेहरू और बल्लभ की,
फिर से आई पाती है
युवा शक्ति जब देश भूलकर,
बस ज़ुल्फों में फंसती है
मुझसे मत पूछो तुम आकर
टीस मुझे क्यों उठती है ?

Read more...

आंसू

>> Sunday, 2 December 2007

अंतहीन सिलसिला
आंसुओं का
किसी की समझ में
क्या कभी आया ?
प्रिय के बिछुड़ने से
या मिलने में ।
उम्मीद के बंधने से
या टूटने में
जिंदगी में हारने से
या जीतने में
सपनों के बिखरने
या संवरने में
सब कुछ खोने
या थोडा सा पाने में
विषमता की धूप से
या समता की फुहार में
ठेठ मनोविज्ञान से
या क्रिया विज्ञान में
बाँहों में असमान से
या खिसकती ज़मीन में
क्यों ?
आखिर क्यों
मुखर हो उठता है
किसी की समझ
नहीं आता कि
कहाँ से कब
और कैसे
प्रारंभ होता है
आंसुओं का
अंतहीन सिलसिला

Read more...

पिछली पांच रचनाएँ

सीधी खरी बात

  © Free Blogger Templates Joy by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP