सुखराम या रामसुख

>> Wednesday, 25 February 2009

कल तक गद्दे में थे नोट
आज लगी है दिल पे चोट
नेता उसको कहते हैं जो
बेशर्मी से मांगे वोट।
दुःख में नींद नहीं आएगी
जेल में सांसे फूल जाएँगी
राम राम अब जप कर काटें
सुख को जाना होगा भूल...

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बिगड़ी फिजां

>> Tuesday, 17 February 2009

खुल के बोली फिजां चाँद पर कीचड़ फेंका,
भागे हैं अब चन्द्र छोड़ के आज मेनका.
उल्टा होता दांव लगाया था जो चौका,
नियति ने अब बना दिया है ख़ुद को छक्का.
लगी ७६ दफा बेचारे किससे रोएँ,
पापी प्रेम के साथ आज फिर तनहा रोएँ.

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अस्पताल..खुलेगा

>> Friday, 6 February 2009

एक और अस्पताल बनेगा
पर गरीब तो बिना इलाज ही
बिना चिकित्सक
तन्हाई में ही मरेगा।
राशन के तेल से तो जल
कर मर नहीं सकता
क्योंकि वो उसकी पहुँच से
बाहर है।
और चुनाव के अलावा उसने
आज तक नेता नामक
प्राणी नहीं देखा।
चाहे जिस दल की सरकार हो
उसके सरकार तो गाँव के ही हैं
माई बाप और भगवान् सब
वही तो हैं..
उसके लिए तो यह ख़बर
भी नहीं है कि कोई
उसके लिए ही यह
बना रहा है॥
फिर भी किसी को तो लाभ
मिलेगा
कोई तो कमीशन खा सकेगा
अस्पताल के निर्माण में
चिकित्सकों की नियुक्ति में
दवाओं की खरीद में और फर्जी
परिवार नियोजन में।
चलो फिर भी एक अस्पताल तो
खुल ही रहा है
किसी का पेट तो भरेगा
चाहे किसी नेता का ही
सही.

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