क्योंकि वह तो है एक शिक्षिका

>> Saturday, 27 June 2009

लम्बी छुट्टी के
बाद फिर से खुलेंगें स्कूल,
किस तरह से फिर से वह
बन जायेगी एक चकरघिन्नी,
सुबह से शुरू होने वाला दिन,
कब रात में बदल जाता है
कुछ पता ही नहीं चलता ?
क्योंकि वह तो है एक शिक्षिका ?
बच्चे का बस्ता,
तो पति का नाश्ता
अपनी क्लास के लेसन प्लान
तो दूसरी की कॉपी जांचना,
बैंक जाने के लिए हाफ डे
मांगने की हिम्मत जुटाना ?
यह सब ही तो रोज़ का है
क्योंकि वह तो है एक शिक्षिका ?
पानी की पतली धार में
परदे और चादर धोना,
उमस भरी गर्मी में अपने
सुख के लिए खाना बनाना,
क्योंकि वही तो है जिसका
है यह घर ?
पति ने तो दे दिए बच्चे
जो केवल उसके ही हैं अब,
ख़ुद बच्चे बन रिमोट
के लिए लड़ते हैं बच्चों से...
स्कूल के झगड़े निपटाना
तो आसान है पर यहाँ तो
दोनों ही अपने हैं,
और एक के पक्ष में होना
दूसरे को अपने खिलाफ करना है ?
बस शोर से बचने के लिए
छौंक में थोड़ा सा पानी डाल कर,
ख़ुद को दूर कर लिया उसने
उस झगड़े के बढ़ते हुए शोर से
क्योंकि वह तो है एक शिक्षिका ?
बच्चा सोना नहीं चाहता पर
उसे तो चाहे अनचाहे
अभी है एक और काम
अपने पत्नी होने का धर्म
निभाना है

और उसे निभाने के लिए
उसकी सहमति की
आवश्यकता नहीं होती
क्योंकि वह तो है एक शिक्षिका


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क्यों पुरूष क्यों ?

>> Friday, 19 June 2009

क्यों कोई
कभी नहीं देखता कि
नारी के और भी
बहुत सारे रूप हैं ?
क्यों एक पुरूष
सदैव ही उसे
भोग लेना चाहता है
भले ही उसकी
सहमति हो या न ?
क्यों हमेशा एक ही
नज़र से देखता है
वह नारी के अन्य
रूपों को भूलकर
क्यों नही दे पाता
उसे स्त्रियोचित
सम्मान जिसकी
हक़दार है वह ?
क्यों जाग जाता है
पुरूष का पुरुषत्व
अबला नारी के सामने
जो समर्पित है उसको ?
क्यों पुरूष
कभी नहीं देखता नारी
की पूर्णता, त्याग ,धैर्य
उसका मान सम्मान
अरे मनुज कभी तो सोचो उस
नारी के दर्द को
जो हर दर्द में भी रखती है
केवल और सदैव ही
तुम्हारी खुशी की थोड़ी सी चाह ?

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आओ ना....

>> Friday, 12 June 2009

आओ ना
फिर से मिलकर गायें
जीवन का वो अद्भुद गीत ॥
आओ ना ....
टूटी साँसों में, विषमता की लौ से
जलते प्राणी के मन में
फिर से जोड़ लें जीवन संगीत
आओ ना ........
बिखरते आसमान से टपकती
किसी व्यक्ति की आशाएं,
झोली में समेट लौटा दें उसे
आओ ना ......
दूर देश गए बेटे की ख़बर
एक झोंका बन कर आज
उसकी माँ तक पहुँचा दें
आओ ना....
सपने देख कर उन्हें
टूटने से पहले ही सहेज कर
सच कर देने को अब
आओ ना....
देश को डस रहे विषधरों से
बचाने सब लोगों को आज
अमृत पान कराने को अब तो
आओ ना....

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मायके जाती लड़कियां..

>> Thursday, 4 June 2009

उम्र चाहे जितनी भी हो
परिवार चाहे कैसा भी हो
पर सब एक जैसी हो जाती हैं
जब मायके जाती लड़कियां।
भूख नहीं लगती,
प्यास नहीं सताती,
बस अपने घर की
चौखट जो एक झटके में,
परायी हो गई थी कभी
फिर से याद आती है।
पापा का चश्मा,
माँ के घुटने का दर्द,
दादी के उलाहने,
बाबा का दुलार,
भाई-बहन के झगड़े,
सहेलियों की अठखेलियाँ,
सब कुछ तो याद करती हैं।
मायके जाती लड़कियां .....
पति के खाने की चिंता,
बच्चों की पढ़ाई,
सासू माँ का कीर्तन,
बाबूजी का स्नेह,
ननद के उलाहने,
देवर की छेड़,
कैसे भूल जाए ?
मायके जाती लड़कियां.......
तभी तो मायके जाकर भी
आधी तो अपने घर
में ही रह जाती हैं।
हर एक की ज़रूरत
उनकी हसरत....
सभी का दारोमदार तो उन
पर ही तो है
बस इसीलिए शायद बदल कर भी
पहले जैसी ही रह जाती हैं
मायके जाती लड़कियां.......

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एक बार फिर से खोना...

>> Tuesday, 2 June 2009

ख़ुद को कोई भूले कैसे, यक्ष प्रश्न है यह ।
फिर भी मिलकर ख़ुद को खोजें मूर्ख सयाने सब ॥
जीवन में ठोकर कितनी हैं दो रोटी की आहट में।
फिर भी हम सब ख़ुद को खोजें जाने किस चाहत में॥
अपनों ने ही ख़ुद को लूटा, जीने की है इच्छा कम।
साथ दे रहे अपने दुश्मन मूक देखता है यह मन॥
जब भी खोया अपना प्रियतम दर्द खरीदा दिल में।
कितना झूठा दर्द लगे है और व्यर्थ यह जीवन॥
टूट रही हैं खिंचती सांसें, रुकता है स्पंदन ।
फिर भी आज सभी जिंदा हैं अपने अपने तन में॥
खोना पाना चलता रहता है मनुष्य के जीवन में
खोज रहे हैं ख़ुद को अब तक पाने की चाहत में...

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