तुम्हीं हो ...

>> Sunday, 20 December 2009

मत पूछो मेरे दिल से, मेरे दिल की चाह को।
पहली से आख़िरी सभी चाहत में तुम्हीं हो ॥

हो चाहें जितनी दुनिया, हों चाहे राहें कितनी ?
शुरुआत से अभी भी मेरी ज़न्नत में तुम्हीं हो।

हर एक की दुआ है कि, मिल जाये साथ तेरा ।
उठते हुए हर हाथ की मन्नत में तुम्हीं हो ॥

कुछ लोग जी गए थे, किसी और राह में ।
इस जिंदगी की राह और राहत में तुम्हीं हो॥


2 टिप्पणियाँ:

naveen 21 December 2009 at 22:04  

Ye "TUMHI"kaun hai..Dr Sahab...?????

KAVITA RAWAT 20 February 2010 at 17:50  

Achhi lagi aapki rachna aur aapka blog.. Likhte rahiyen
Bahut badhai

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