सावन के बहाने

>> Wednesday, 8 July 2009

फिर से लग गया
सावन का महीना,
मन में झूले
पुरवा हवा
रिमझिम बरसात
की याद...
उतरती हुई जुर्राब की तरह
उलटती चली गई।
फिर से सोच कि
काश ! बरस जाते बदरा
एक समान पूरी धरती पर
माँ के निश्छल प्यार के समान..
कहीं बाढ़ कहीं सूखा
क्यों है अब स्थायी भाव ?
भीग जाता प्रेमी का मन
किसान का खेत
अर्थ व्यवस्था में होते नव अंकुरण....
पर किसी का क्या दोष ?
हम ही नहीं रख पाए प्रकृति की थाती
को संजो कर,
लूट लिया जो मिल गया
बिना किसी मोल
अब तो चुकाना ही होगा ना
जीवन में यह क़र्ज़
हर बार नाप-तोल ....

1 टिप्पणियाँ:

दिगम्बर नासवा 9 July 2009 at 19:03  

हम ही नहीं रख पाए प्रकृति की थाती
को संजो कर,
लूट लिया जो मिल गया
बिना किसी मोल

सच कहा है.........हमने loota तो hamen ही chukaana padhega इसका hisaab........ अपने gunaah की saja आप ही bhugatni होगी.....sundar rachna है.......

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