Wednesday, 17 December 2014

जन्नत और ज़ुल्म

तेरी आँखों का पानी तो सूखेगा ही नहीं
खून के रंग से कुछ खौफ तुझे है भी नहीं
तेरा मालिक कभी और अलग होगा नहीं
तेरी नफरत से भला तेरा कभी होगा नहीं

अब भी मौका है ज़रा देख ख़ुशी बच्चों की
कितने मासूम हैं तू खुद भी पिघल जायेगा
तेरी वो सोच उन्हें कुछ कभी दे सकती है
कभी पूछ के तो देख कभी अपने से ?

#पेशावरहमला 


Thursday, 20 June 2013

रूद्र

हे ! रूद्र रूप
हे ! महारुद्र,
ये रौद्र रूप
तुम मत धारो ...

तुम विष को धारण
करते हो,
अपने जन को
मत संहारो ....

तुम भोले हो
तुम अविनाशी,
हो शांत
नहीं अब नाश करो ....

तुम ज्ञानी हो
सर्वज्ञ तुम्हीं,
हम अज्ञानी
मत क्रोध करो ....

बद्री विशाल !
तुम हो विशाल,
भोले के तांडव
को रोको ....

हम तो सेवक
तेरे केदार,
बस अब
त्रिनेत्र को बंद करो ....

हे ! विश्वनाथ अब
स्थिर होकर,
प्रभु "आशुतोष"
का रूप धरो ........

Monday, 31 December 2012

नया वर्ष ?

क्या उपलब्धि है हमारी
क्या ख़ास किया हमने इस वर्ष ?
क्या करने की अभिलाषा है
हम सब की अगले वर्ष ?
ऐसे ही पन्ने पलटते जायेंगें
कैलेंडर्स के ....
हम गिनते रह जायेंगें 13 /14 / 15
और भी न जाने कितने
नए वर्ष ऐसे ही आते जायेंगें ?
क्या कभी हम पुरुषत्व के उस
दल दल से बाहर आकर
समझ सकेंगें
नारी के कोमल मन को ?
दे सकेंगें उसको वह सम्मान
जिसकी हक़दार होती है
वह माँ की कोख़ से ...
फिर भी क्यों मनाएं एक
और दिखावटी नया वर्ष ?
जब हम आज भी जी रहे हैं
उसी युगों पुरानी मानसिकता में
जो नहीं बदल सकती या
बदलना ही नहीं चाहती .....

Saturday, 29 December 2012

चुप ही रहूँ ....

तेरा ये चुभन भरा बलिदान,
आज छलनी कर रहा है स्वाभिमान
किसी और लोक में बसी तू,
चुप रहकर भी रुला रही है ......
किस तरह सांत्वना को समेटूं
किस तरह जवाब दूं उन
घुटी हुई चीखों का
जो दफ़्न हो गयीं
तेरे अधूरे सपनों की तरह ?
बोलना तो है पर
लगता है खिंच गयी ज़बान मेरी ...
तेरे उन सवालों के जवाब
पुरुष मानसिकता में खोजने में
जो आज भी उतने ही अधूरे हैं
बिलकुल तेरे सपनों की तरह .....
जो केवल मन के कैनवास
पर उड़ते थे उन सावन के
बिंदास बादलों की तरह
जिन्हें क़ैद कर दिया किसी ने
पूस की सन्नाटे भरी रात में .....
तू बन गई एक प्रतिमूर्ति
पुरुष के खोखले दिखावे भरे प्रतीकों
से उलझ जाने में ...
थम सी रही है आज फिर से कलम
उस स्याह रात की याद में
सूखी हुई स्याही से क्या लिखा जाए
दिल की मासूम परत पर
चलो फिर से कोई नश्तर चलाकर
सुर्ख पर सर्द हुए
तेरे उस खूं की कसम
गर्म अब खून हमारा भी
रहेगा बरसों ......

Wednesday, 21 March 2012

सब

वो आरज़ू भी जुस्तजू भी और सब भी हैं
मेरे नहीं तो खुद कहो वो और किसके हैं ?
पाया उन्हें जो दिल से तो फिर चाह न रही
उनको बना के जान अब जिंदा हुआ हूँ मैं........  

Wednesday, 13 July 2011

दुनियादारी

दर्द सीने का अभी, चेहरे पे आ जाता है !
वक्त के साथ हुनर, उसमें भी आ जायेगा !!

जो बस सबकी ख़ुशी, के लिए ही जीता है !
मौत के बाद वही, सबको रुला जायेगा !!

साथ रहने की क़सम, रात दिन जो खाता है !
क्या पता एक रोज़, वो भी बदल जायेगा  !!

छिपकर के किसी रोज़, कहीं दांव खेलता है !
जीती बाज़ी कोई वो, फिर से हार जायेगा !

आज वो फिर से मुसीबत में घिरा लगता है !
वाकई कौन सगा है,  पता चल जायेगा... !!

Friday, 25 March 2011

कोई

किसी ने शाख़ और टहनी को फिर दुरुस्त किया !
ज़मीं पे आज फिर बिखरा है आशियाँ कोई !!

किसी ने सोच समझ बोल कर रिश्ते बदले !
भरे बाज़ार में फिर दिख गया तनहा कोई !!

किसी की आरज़ू और किस की ख़ता के चलते !
बिना गुनाह कहीं बन रहा मुजरिम कोई !!

किसी के हुस्न और किस की अदाओं के सदके !
दिल से मजबूर हुआ दूर दीवाना कोई !!

किसी की प्यास पे हावी हुआ जुनूँ इतना !
भरी बरसात में भी रह गया प्यासा कोई !!