आंसू

>> Sunday, 2 December 2007

अंतहीन सिलसिला
आंसुओं का
किसी की समझ में
क्या कभी आया ?
प्रिय के बिछुड़ने से
या मिलने में ।
उम्मीद के बंधने से
या टूटने में
जिंदगी में हारने से
या जीतने में
सपनों के बिखरने
या संवरने में
सब कुछ खोने
या थोडा सा पाने में
विषमता की धूप से
या समता की फुहार में
ठेठ मनोविज्ञान से
या क्रिया विज्ञान में
बाँहों में असमान से
या खिसकती ज़मीन में
क्यों ?
आखिर क्यों
मुखर हो उठता है
किसी की समझ
नहीं आता कि
कहाँ से कब
और कैसे
प्रारंभ होता है
आंसुओं का
अंतहीन सिलसिला

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