एक बार फिर से खोना...

>> Tuesday, 2 June 2009

ख़ुद को कोई भूले कैसे, यक्ष प्रश्न है यह ।
फिर भी मिलकर ख़ुद को खोजें मूर्ख सयाने सब ॥
जीवन में ठोकर कितनी हैं दो रोटी की आहट में।
फिर भी हम सब ख़ुद को खोजें जाने किस चाहत में॥
अपनों ने ही ख़ुद को लूटा, जीने की है इच्छा कम।
साथ दे रहे अपने दुश्मन मूक देखता है यह मन॥
जब भी खोया अपना प्रियतम दर्द खरीदा दिल में।
कितना झूठा दर्द लगे है और व्यर्थ यह जीवन॥
टूट रही हैं खिंचती सांसें, रुकता है स्पंदन ।
फिर भी आज सभी जिंदा हैं अपने अपने तन में॥
खोना पाना चलता रहता है मनुष्य के जीवन में
खोज रहे हैं ख़ुद को अब तक पाने की चाहत में...

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