मायके जाती लड़कियां..

>> Thursday, 4 June 2009

उम्र चाहे जितनी भी हो
परिवार चाहे कैसा भी हो
पर सब एक जैसी हो जाती हैं
जब मायके जाती लड़कियां।
भूख नहीं लगती,
प्यास नहीं सताती,
बस अपने घर की
चौखट जो एक झटके में,
परायी हो गई थी कभी
फिर से याद आती है।
पापा का चश्मा,
माँ के घुटने का दर्द,
दादी के उलाहने,
बाबा का दुलार,
भाई-बहन के झगड़े,
सहेलियों की अठखेलियाँ,
सब कुछ तो याद करती हैं।
मायके जाती लड़कियां .....
पति के खाने की चिंता,
बच्चों की पढ़ाई,
सासू माँ का कीर्तन,
बाबूजी का स्नेह,
ननद के उलाहने,
देवर की छेड़,
कैसे भूल जाए ?
मायके जाती लड़कियां.......
तभी तो मायके जाकर भी
आधी तो अपने घर
में ही रह जाती हैं।
हर एक की ज़रूरत
उनकी हसरत....
सभी का दारोमदार तो उन
पर ही तो है
बस इसीलिए शायद बदल कर भी
पहले जैसी ही रह जाती हैं
मायके जाती लड़कियां.......

1 टिप्पणियाँ:

Ankit 2 July 2009 at 19:25  

सच ही कहा है किसी ने की विवाह के बाद स्त्री के नव जीवन का आरम्भ होता है .....
और गृह लक्ष्मी ही एक मात्र ऐसी लक्ष्मी है जो चंचला नहीं है .... धीर गंभीर ... परिवार को लेकर चलने वाली ....
लेकिन नारियां तो यहाँ भी अपनी अभिलाषाओं को को दबाकर भी ख़ुशी में गाती हैं

ससुराल गेंदा फूल ...

क्योंकि उनकी प्रकति ही है सबको सुख प्रदान कर सुखी रहना .......

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