मजबूरी

>> Sunday, 2 August 2009

फिर से आता
राखी का त्यौहार
उसकी तो सोच ही
बदल जाती ।
कुछ समझ नहीं पाता
कि कैसे समझाए
अपनी बहन को जो
फिर से करेगी इंतज़ार
उसकी कलाई का
बुनेगी सपने अरसे बाद राखी बाँधने के॥
जब भी देखता है वह अपनी
बचत को जो बहुत कम है
सोच लेता है कि कह दूँगा
मिल पा रही है अभी छुट्टी नहीं
फिर कोशिश करूंगा.......
आख़िर पिछले कई सालों से
यही झूठ बोलकर ही तो
समझाता रहा हूँ उसे
और रोता रहा हूँ
बहुत देर तक उससे बात करने के बाद....
क्या इसी को कहते हैं
मजबूरी ?

1 टिप्पणियाँ:

अर्चना तिवारी 4 August 2009 at 22:27  

बहुत दर्दीली कविता ....

पिछली पांच रचनाएँ

सीधी खरी बात

  © Free Blogger Templates Joy by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP