Thursday 27 August 2009

क्यों ?

खुशियाँ
कब आती हैं
आँगन में कैसे पता चले ?
मन के भाव
चुपके से
बदल जाते हैं
एक स्त्री के लिए
माँ बनना हमेशा ही
रहता है एक सम्पूर्ण सपना !!!
फिर भी क्यों पुरूष
अपनी चाह को मिटा कर,
मिटा देना चाहता है एक
आती हुई जिंदगी को !!
सिर्फ़ यह कहकर
की कौन संभालेगा
ये ज़िम्मेदारी
देखो न कितनी मंहगाई भी है ?
कैसे चलेगा खर्च और भी
न जाने क्या क्या बातें ??
पर भूल जाता है
वो सब जब फिर से अकेला होता है
उसके साथ
कोई मंहगाई कोई भी ज़िम्मेदारी
उसे रोक नहीं पाती
फिर से एक नयी ज़िन्दगी
की उम्मीदें मार डालने में ???
वह तो बस सिसक सकती है
क्योंकि उसके संस्कार चुप कर देते है उसे
पर क्या कोई संस्कार होते हैं पुरुष के भी ?

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