जिंदगी

>> Wednesday, 9 September 2009

दिल खो गया है दिल का, या ये मेरी खता है.

मेरे अजीज़ खास,   परेशान बहुत हैं..
उनके करीब होने से बदल जाती है दुनिया,
मेरी जिंदगी के सच से वो अनजान बहुत हैं..
हों राहें कितनी मुश्किल या दुश्वार मंजिलें ,
वो हमसफ़र जो हों तो सब आसान बहुत है..
मैं बच गया हूँ कैसे इन तूफानी राहों में, 
ये देख के सब लोग अब हैरान बहुत हैं..
वो और रहे होंगें जिन्हें नाम की थी चाह,  
मेरे खुदा के साथ मैं गुमनाम बहुत हूँ...

4 टिप्पणियाँ:

विपिन बिहारी गोयल 9 September 2009 at 17:53  

बहुत सुंदर रचना है

deepak 10 September 2009 at 08:07  

hum dhundte hai jinko
vo sapno ke hamrah rahe
besak mile na manjil
par manjilo ki talash h
mera karva to rahe

Dr Deepak Dhama
Khekra Baghpat-NCR
9412549368
9411959400

deepak 5 October 2009 at 09:23  

इंसान बन और इंसान को पहचान
जीवन है कम कर ले कुछ काम
जिन्दगी है क्या की पानी का एक बुलबुला
फिर क्यों तेरा मेरा कर रहा है इंसान

डॉ दीपक धामा
खेकडा बागपत-NCR
9412549368
nidhiclinic@gmail.com

deepak 5 October 2009 at 09:23  

इंसान बन और इंसान को पहचान
जीवन है कम कर ले कुछ काम
जिन्दगी है क्या की पानी का एक बुलबुला
फिर क्यों तेरा मेरा कर रहा है इंसान

डॉ दीपक धामा
खेकडा बागपत-NCR
9412549368
nidhiclinic@gmail.com

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