चाहता हूँ

>> Monday, 13 August 2007

एक पथ पर रोज़ उठ कर बढ़ चलें कुछ तो क़दम,
मैं स्वयं की राख से फिर घर बनाना चाहता हूँ।
विश्व में नित बढ़ रही हैं क्रोध की चिंगारिया,
मैं इसी आवेश में, ख़ुद को जलाना चाहता हूँ।
खींच कर अब तो धारा को उच्चतम ऊँचाई तक,
मैं क्षितिज की सीमा रेखाएं मिटाना चाहता हूँ.
नैन से लुढ़के हुए दो, आंसुओं की धार को,
कंप-कंपाती उँगलियों से पोंछ लेना चाहता हूँ.
बाल पन की वो ढिठाई, और सबका रोकना,
मैं वही बागों के झूले झूल जाना चाहता हूँ.
प्रेम में तो कोई जीता और कोई रह गया,
मैं समय के बंधनों को तोड़ देना चाहता हूँ।
राह में जितने बिछे हैं कंटकित अवरोध जो
मैं उन्हें अपने सिरहाने, पर संजोना चाहता हूँ.
बन गए जो मेरे अपने एक मांझी की तरह
मैं उन्हीं की नाव की पतवार बनना चाहता हूँ...

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